चाणक्य नीति

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चाणक्य नीति

चाणक्य कहते हैं की ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य और शूद्र में ब्राह्मण सबसे अधिक श्रेष्ठ और आदरणीय होते हैं। किसी भी परिस्थिति में हमें सत्कार करना चाहिए।

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स्त्रियों के लिए उसका प्रति ही उसका आदरणीय गुरु होता है क्योंकि वही उसका भरण पोषण करता है और उसे सन्मार्ग पर ले जाने में सहायता करता है।

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चाणक्य कहते हैं कि घर में आए हुए अतिथि का आदर सत्कार सभी लोगों को करना चाहिए क्योंकि वह बहुत थोड़ी देर के लिए किसी के घर आता है अतिथि देवो भव ऐसा शास्त्र में भी कहा गया है।

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सज्जनता, चरित्र, गुण और आचार व्यवहार इन 4 बातों से श्रेष्ठ मनुष्य की पहचान की जा सकती है।

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बुद्धिमान व्यक्तियों को संकटों और आपत्तियों से तभी तक डरना चाहिए जब तक वह सिर पर न आ जाएं। दुख और संकट आने पर मनुष्य को अपनी पूरी शक्ति लगाकर उसे दूर करने का प्रयास करना चाहिए।

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जिस प्रकार एक ही बेर के वृक्ष में लगे हुए फल मीठे नहीं होते हैं। उसी प्रकार एक ही माता के पेट और एक ही नक्षत्र में उत्पन्न हुए बालक गुण कर्म और स्वभाव में एक समान नहीं होते हैं।  

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अधिकारी कभी लोभरहित नहीं सकता है। श्रृंगार प्रेमी में कामवासना की अधिकता होती है। जो व्यक्ति चतुर नहीं है वह मधुर भाषी भी नहीं हो सकता। और स्पष्ट बात कहने वाला कभी धोखा नहीं दे सकता है।   

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एक मूर्ख व्यक्ति विद्वान व्यक्ति से हमेशा घृणा करता है। एक गरीब व्यक्ति धन वालों को अपना शत्रु समझते हैं। वेश्याएं कुलीन स्त्रियों से घृणा करती हैं। और एक विधवा स्त्री सुहागिनों को अपना शत्रु मानती है।

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आलस्य के कारण विद्या नष्ट हो जाती है। विद्या की प्राप्ति और उसकी वृद्धि के लिए व्यक्ति को कभी आलस्य नहीं करना चाहिए। एक आलसी व्यक्ति किसी गुण को प्राप्त नहीं कर सकता है।

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