100+ Mythological Facts : पौराणिक कथाओं से जुड़े रोचक तथ्य

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Mythological Facts, Indian Mythology, रामायण से जुड़े रोचक तथ्य, महाभारत से जुड़े रोचक तथ्य, पुराणों से जुड़े रोचक तथ्य, विष्णु पुराण तथ्य, शिव पुराण तथ्य, शास्त्रों से जुड़े रोचक तथ्य आदि पौराणिक गाथाओं की सच्ची जानकारी के बारे में इस लेख में बताया गया है तो आइए जानते हैं।

पौराणिक रोचक तथ्य (Mythological Facts)

कुंभकर्ण 6 महीने क्यों सोता था?

कुंभकरण एक बहुत ही शक्तिशाली राक्षस था, जिसने भगवान ब्रह्मा की तपस्या करके उनको प्रसन्न किया था। इस पर ब्रह्मा जी ने उसे कहा की मांगों क्या वरदान मांगना चाहते हो। तब कुंभकरण ब्रह्मा जी से वरदान में इंद्रासन मांगना चाहता था लेकिन उसके मुख से इन्द्रासन की जगह निद्रासन निकल गया। कहां जाता है की उस समय माता सरस्वती स्वर्ग को राक्षसों से बचाने के लिए कुंभकरण के मुख में विराजमान हो गई थीं। इस प्रकार कुम्भकर्ण का वरदान उसके शाप में बदल गया.

शनिदेव को किसने बंदी बनाया?

क्या आप जानते हैं कि मेघनाथ के जन्म के समय रावण ने सभी ग्रहों को अपनी कक्षा से निकल कर ग्यारहवीं कक्षा में रहने को कहा था। कहा जाता है किसी की कुंडली में ऐसा होने पर उसके जीवन में धन और इच्छा पूर्ति होती है। लेकिन शनिदेव ने ऐसा नहीं किया वे ग्यारहवीं की जगह बारहवीं कक्षा में चले गए। जिसके कारण रावण उनसे युद्ध करने चला गया। कहा जाता है कि रावण ने शनि देव को हराकर बंदी भी बना लिया था।

एक बार रावण की बात न मानने के कारण उसने शनिदेव को युद्ध में हराकर लंका में ही बंदी बना लिया था. इसके बाद जब माता सीता की खोज में आये महाबली हनुमान जी ने माता सीता से मिलने के बाद लंका से जाते समय उन्होंने शनिदेव को बंदी बने हुए देखा तो उन्होंने शनिदेव को मुक्त किया. हनुमान जी से प्रसन्न होकर शनिदेव ने उनको ये आशीर्वाद दिया की जो आपकी (हनुमान जी की) पूजा करेगा उस पर शनिदेव कभी बुरी दृष्टि नहीं डालेंगे अथवा वह उनकी बुरी दृष्टि से मुक्त हो जायेगा.

रावण की बेटी कौन थी?

Mythological Facts : कम्बोडियन और थाई रामायण संस्करण के अनुसार रावण की बेटी स्वर्णमछा ने अपने पिता रावण के कहने पर राम सेतु को गुप्त रूप से तोड़ने के लिए कहा इसके बाद वानरों द्वारा बनाये जा रहे रामसेतु में लगे पत्थरों को स्वर्णमछा समुद्र में जाकर चुराने लगी. जब हनुमान जी को इस बात का पता चला तो हनुमान जी ने स्वर्णमछा को रोकने के लिए उसको रामसेतु बनाने के पीछे की पूरी घटना का वर्णन किया. हनुमान जी के इस स्वभाव और उनके रूप को देखकर स्वर्णमछा उनपर मोहित हो गयी और रामसेतु से चुराए सभी पत्थरों को वापस रामसेतु में लगा दिया.

हनुमान जी का अहंकार कैसे भंग हुआ?

क्या आप जानते हैं जब रामसेतु के निर्माण से पहले भगवान राम ने रेत से महादेव की स्थापना तब हनुमान जी ने भी एक शिवलिंग का निर्माण किया था और हनुमान जी चाहते थे कि उनका बनाया हुआ शिवलिंग की ही पूजा की जाए तब भगवान राम ने हनुमान जी का मान मर्दन करते हुए यह कहा कि ठीक है मेरे बनाये हुए शिवलिंग को हटा कर अपने बनाये हुए शिवलिंग को रख दो तो उनकी ही पूजा हो जाएगी। इसके बाद हनुमान जी ने रेत से बने श्री राम जी के शिवलिंग को हटाने की बहुत कोशिश की परंतु वे उस शिवलिंग को हिला भी नहीं पाए। इस प्रकार हनुमान जी का अहंकार टूट गया। उस शिवलिंग को रामेश्वर ज्योतिर्लिंग के नाम से जाना जाता है। लेकिन रामेश्वरम में हनुमान जी के बनाये हुए शिवलिंग की भी पूजा की जाती है।

Mythological Facts : धृतराष्ट्र के दुख का कारण क्या था?

महाभारत के युद्ध में धृतराष्ट्र के सौ पुत्रों की मृत्यु उसके जीवित रहते हुए होने के पीछे का रहस्य यह था कि उसके पिछले जन्म में वह एक कबीले का राजा था जिसके राज्य में रहने वाले लकड़हारे के परिवार में उसकी पत्नी और उसके 100 पंछी थे जिनको राजा की बीमारी ठीक करने के लिए उसके बावर्ची ने बना के खिला दिया था। तब लकड़हारे की पत्नी ने राजा को शाप दिया कि जिस प्रकार तुमने मेरे प्रिय 100 पंछियों को मारा है और मुझे ये दुख दिया है। उसी प्रकार तुम्हें भी जीवित रहते तुम्हारे पुत्रों की मृत्यु देखनी पड़ेगी और जिस प्रकार मुझे यह दुख प्राप्त हुआ है उसी प्रकार तुम्हें भी यह दुख प्राप्त होगा।

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Mahabharat Story- धृतराष्ट्र ने ऐसा कौन सा पाप किया था जिसके कारण उसे महाभारत युद्ध में हुई अपने 99 पुत्रों की मृत्यु का दुःख प्राप्त हुआ?

हनुमान जी की भी मृत्यु हुई थी?

वैसे तो भगवान श्रीराम ने हनुमान जी को चिरंजीवी होने का वरदान दिया था। लेकिन उड़िया भाषा की विलंका रामायण के अनुसार हनुमान जी की मृत्यु हुई थी। इसमें बताया गया है कि एक बार विलंका राक्षस राज सहशिरा से युद्ध करने भगवान श्री राम विलंका गए थे। वहां भगवान श्रीराम को राक्षसों में बंदी बना लिया था। कई दिनों तक भगवान श्री राम के वापस ना आने पर माता सीता ने हनुमान जी को श्री राम की खोज करने के लिए विलंका भेजा।

भगवान श्री राम की खोज में हनुमान जी विलंका पहुंचे। लंका में द्वार के पास एक तालाब था इस तालाब में स्वच्छ जल था। लेकिन इस तालाब की एक खासियत थी की कोई शत्रु अगर राज्य का अहित करने के लिए मकसद से वहां आता है तो वह जल जहर बन जाता था। मुख्य द्वार पर एक राक्षसी का पहरा था जो शत्रुओं को पहचान कर उनकी हत्या कर देती थी। हनुमान जी के वहां पहुंचने पर राक्षसी को समझ आ गया कि यह कोई शत्रु है तो वह अपना शरीर छोटा करके हनुमान जी के कंठ में जाकर बैठ जाती है इस कारण हनुमान जी को बहुत तेज प्यास लगने लगती है। प्यास लगने के कारण हनुमान जी उस तालाब का जल पीने लगते हैं जैसे ही वह जल पीते हैं वैसे ही हनुमान जी की मृत्यु हो जाती है।

कई दिन बीत जाने पर जब भगवान श्री राम और हनुमान जी का कुछ पता नहीं चलता है तो देवता पवन देव से पूछते हैं कि आपका पुत्र कहां है। तब बृहस्पति देव पता लगा कर बताते हैं की हनुमान जी की विलंका में मृत्यु हो चुकी है। इसके बाद सभी देवता गण हनुमान जी को संजीवनी और अमृत के द्वारा जीवित करते हैं। हनुमान जी 6 महीने के बाद मृत्यु की गोद से वापस आ जाते हैं।

हिन्दू धर्म में कितने देवता होते हैं?

हिंदू धर्म के अनुसार गाय में 33 कोटि देवता निवास करते हैं। कोटि का अर्थ करोड़ नहीं बल्कि प्रकार होता है अर्थात 33 प्रकार के देवता गौ माता में निवास करते हैं। इन देवताओं में 12 आदित्य, 8 वसु, 11 रुद्र और 2 अश्विन कुमार हैं। ये सभी मिलकर कुल 33 कोटि देवता होते हैं।

हिन्दू धर्म ग्रंथों में चल और अचल दोनों प्रकार के देवताओं का उल्लेख किया गया है। श्री मद्भागवत गीता में भगवान श्री कृष्णा ने कहा है कि चल देवता के रूप में धरती पर सभी प्राणी हैं जिनमें आत्मा रूप में मैं स्वयं निवास करता हूं। अचल देवता उन्हें माना गया है जिनकी हिन्दू धर्म में मूर्ति रूप में पूजा की जाती है।

द्रौपदी का चीरहरण होने पर भगवान श्री कृष्ण ने उनकी लाज क्यों बचाई?

ये तो आप सभी को पता होगा कि द्रौपदी का जब भरी सभा में चीरहरण हुआ था तब उस सभा में कोई भी नहीं था उनकी रक्षा करने वाला यहां तक कि द्रौपदी के पांचों पतियों ने भी उनकी रक्षा नहीं की तब उन्होंने भगवान श्री कृष्ण को पुकारा और उन्होंने उनकी लाज बचाई। लेकिन इस घटना के पीछे द्रौपदी के कर्मों का फल था जिसकी वजह से भगवान श्रीकृष्ण जी ने द्रौपदी की लाज बचाई।

महाभारत के अनुसार जब युधिष्ठिर ने जब राजसूय यज्ञ किया था तब महाराज युधिष्ठिर ने श्री कृष्ण को प्रथम अर्घ्य दिया जिससे शिशुपाल क्रोधित हो गया और श्रीकृष्ण को गालियां देने लगा जिससे क्रोधित होकर भगवान श्रीकृष्ण ने अपने सुदर्शन चक्र से शिशुपाल का सिर काट दिया था। जिससे उनकी उंगली कट गई थी। उनकी उंगली से रक्त निकलता देख कर द्रौपदी ने अपनी साड़ी का टुकड़ा फाड़कर भगवान की उंगली में पट्टी बांध दी थी जिसके फल स्वरूप भगवान ने द्रौपदी के चीरहरण के समय उनकी साड़ी ( चीर) बढ़ा दिया और द्रौपदी की लाज बचाई।

इसके अलावा द्रौपदी का एक कर्म पिछले जन्म का भी था जिसके बारे में शायद ही आपको पता होगा। एक बार की बात है द्रौपदी के किसी पिछले जन्म में, एक नदी में एक संत स्नान कर रहे थे। स्नान करते समय उनकी लंगोट खुलकर बह जाती है। सन्त बहुत ही लज्जित अवस्था में नदी के अंदर ही खड़े रहते हैं। लेकिन नदी के बाहर नही निकल रहे होते हैं। यह देखकर द्रौपदी उनके पास जाकर उनको नमन करती है और सन्त से उनके नदी से बाहर न निकलने का कारण पूछती हैं तब सन्त सारी बात बताते है। इस पर द्रौपदी अपनी साड़ी का एक टुकड़ा फाड़कर सन्त को दे देती है। जिसे पहनकर सन्त नदी से बाहर निकल पाते हैं। इसके बाद सन्त जी द्रौपदी को आशीर्वाद देते हैं कि आज जैसे तुमने मेरी लाज बचाई है भगवान तुम्हारी लाज बनाये रखे। इसी कर्म के कारण भगवान श्रीकृष्ण ने द्रौपदी की लाज बचाई थी।

कलियुग कहाँ कहाँ निवास करता है?

महान अभिमन्यु के पुत्र राजा परीक्षित ने कलियुग को केवल 4 जगह रहने की अनुमति दी थी।

  • वेश्यालय
  • मदिरालय
  • स्वर्ण
  • द्युत (जुआ)

शकुनि के पासे चमत्कारी क्यों थे?

महाभारत में शकुनि जोकि बहुत ही चालक था। वह द्युत क्रीड़ा का माहिर खिलाड़ी था। उसके पास जो पासे थे वह बहुत ही चमत्कारी थे। वह जो भी अंक बोलता था उसके पासे में वही अंक आता था। लेकिन क्या आप जानते हैं कि शकुनि के वह पासे उसके पिता की अस्थियों से बने थे और सिर्फ उसकी बात मानते थे।

क्या कभी पर्वतों के भी पंख हुआ करते थे?

क्या आल जानते हैं कि सतयुग में पर्वतों के भी पंख हुआ करते थे। जब इंद्रदेव के यज्ञ में बाधा उत्पन्न हुई तो उन्होंने सभी पर्वतों के पंख काट दिए। लेकिन वायुदेव ने परवैतिन के राजा मैनाक पर्वत की रक्षा की। यही मैनाक पर्वत एकलौता पंखधारी पर्वत बचा। समुद्र लांघकर जब हनुमान जी लंका जा रहे थे तो इसी मैनाक पर्वत ने हनुमान जी से विश्राम करने की विनती की थी।

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